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तुम साथ थे हमारे

माना डगर कठिन था,
मुसीबतो का घर था,
लेकिन यहीं क्या कम था,
तुम साथ थे हमारे

तूफां उठा अचानक,
दरिया में घिर गए थे,
छूटा कहाँ किनारा,
कुछ भी ना देख पाये,
बिजली चमक के सहसा,
दिखला, नये किनारे,
तुम साथ थे हमारे

माँगा कहाँ था हमने,
सुरज की रौशनी को,
अम्बर की चाँदनी को,
लौटा दो, मुझे तुम मेरे,
सारे छितिज़ अधूरे,
तुम साथ थे हमारे ।

Comments

  1. it is the most beautiful description of the value of someone's companionship......
    especially the last one...lauta do mujhe.....is marvel.....

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  2. कविता कैसी लगी मुझे, यह तुम जानते ही हो. अब बस ब्लॉग पर निरंतरता लाओ और जीवन के समस्त व्यमोहों में निभृत अपनी प्रतिभा को बाहर लाओ

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    Replies
    1. Koshish yahi hai. Aapke margdarshan me ye bhi ho hi jayega ab :)

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  3. quite sometimes i have re-read all of them.. nirantarta bhi laao..

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  4. This one is nice and touchy. It has refreshed my memories n relation with my best friend...Good work.keep it up

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अन्धेरे मे

अन्धेरे मे खुद को, कोइ सम्भल्ता नही है, हवा खुद ही आती है, कोइ लाता नही है, आसमा मे चमकती, बिजली असहाय है, कड़क के गिरती है, कोई सम्भालता नहीं है, दुनिया के हर रूप से, उठ चुका है यकीं आज, आज तो इंसान को खुद पे भी यकीं आता नहीं है, जहर हाथों मे है, पर  कायर मर पाता नहीं है, जिंदगी से है नफ़रत, मौत से यारी कर पाता नहीं है | ~अभि  

चलना ही होगा

भ्रमित चिंतित हो या विचलित, ज़िन्दगी  के इस डगर पे, चलना ही होगा ए मुसाफिर धूल मिट्टी और कंकड़, राह  में कांटे भी होंगे, चाहे हस के चाहे रो के, सहना ही होगा ए  मुसाफिर मीत प्रीत और उपवन, राह में  मुस्कानें भी होंगी, दो घड़ी आराम करके, उठना ही होगा ए मुसाफिर हार जीत और यादे, राह में पीड़ा भी होगी, वेदना में लिप्त हो या, धैर्यता से मुस्कुरा के, बढ़ना ही होगा ए मुसाफिर जाड,ग्रीष्म और वसंत, राह में सावन भी होगा, बरखा कि कभी बूंद होंगी, मरुथल कि कभी रेत होगी, मंजिल कभी पास होगी, कभी, मंजिल कि बस प्यास होगी, आश से मन जब भरा हो, साँस तन में हो धड़कती, नापने आकाश कितने, तू अगर जो रुक गया तो, रह जायेंगे, कितने सपने अधूरे, चाहे दो पल छाँव में, नैनो को तू विश्राम दे ले, फिर तुझे उन्मक्त मन से, छितिज़ को छूना ही होगा,ए मुसाफिर।