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अब और पहले

अब तो,
खुली आँख हीं कट जाती है रात,
नींद के ना आने पर,
पहले,
सुना देती थी माँ लोरी,
मुझको सुलाने के लिये


गिरता, पड़ता और लड़खड़ाता,
होता ये सब तो, आज भी लेकिन,
अब तो,
संभलना खुद हीं पड़ता है,
ठोकरें खाने के बाद,
पहले,
बढ़ा देते थे हाथ,
बाबूजी मुझको उठाने के लिये


हार, जीत और संघर्ष,
हैं जिन्दगी में, आज भी लेकिन,
अब तो,
सूनी है हर जीत  और,
रह जाता अकेला, हार के बाद,
पहले,
मनाते थे ख़ुशी हर जीत की और,
होते थे कई मीत, गम को बटाने के लिये


प्यार, द्वेष और रिश्ते,
हैं भावनायें सारी, आज भी लेकिन
अब तो,
मर जाते हैं रिश्ते,
बुरा समय आने के बाद,
पहले,
मर जाते थे लोग,
रिश्तों को निभाने के लिये

~ अभि (१६ फरवरी २०१४)

Comments

  1. अरे यह तो जज्बात में डूबी हुई कविता है. माँ और बाबूजी का हाथ तो अब भी है लेकिन इतनी दूर जो बैठे हो. अब सोचो मैं क्यों कहता हूँ गंगा की माटी पर लौट जाने के लिए. ऐसे ही लिखते रहो.अति सुन्दर.

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  2. It is very touching, and expressing the harsh reality of life........SO TRUE....

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